Saturday, August 29, 2015

बहुत याद आती है "दीदी" तुम्हारी मुझे "भाई" कहके बुलाना.........

बहुत याद आती है "दीदी" तुम्हारी मुझे "भाई" कहके बुलाना ,
वो मद्धम सा मुस्कुराना और वो झूठ-मूठ का गुस्सा दिखाना,
समझना मेरी हर बात को और मुझे हर बात समझाना,
वो लड़ना तेरा मुझसे और फिर प्यार जताना,
बहुत याद आती है "दीदी" तुम्हारी मुझे "भाई" कहके बुलाना,
वो शाम ढले करना बातें मुझसे और अपनी हर बात मुझे बताना,
सुनके मेरी बेवकूफियां तुम्हारा ज़ोर से हंस जाना,
मेरी हर गलती पे लगाना डांट और फिर उस डांट के बाद मुझे प्यार से समझाना,
कोई और न होगा तुमसे प्यारा मुझे यह आज मैंने है जाना,
वो राखी और भाई-दूज पे तुम्हारा टीका लगाना,कुमकुम मैं डूबी ऊँगली से मेरा माथा सजाना,
खिलाना मुझे मिठाई प्यार से और दिल से दुआ दे जाना,
बाँध के धागा कलाई पे मेरी अपने प्यार को जताना,
कभी बन जाना माँ मेरी और कभी दोस्त बन जाना,
देना नसीहतें मुझे और हिदायतें दोहराना,
जब छाये गम का अँधेरा तो खुशी की किरण बनके आना,हाँ तुम्ही से तो सिखा है मैंने गम मैं मुस्कुराना,
कहता है मन मेरा रहके दूर तुमसे मुझे अब एक लम्हा भी नही बिताना,अब बस "ॐकार" को तो है अपनी "गीता दीदी(all beloved sister)" के पास है जाना,
हैं बहुत से एहसास दिल मैं समाये पता नही अब इन्हे कैसे है समझाना

,बस जान लो इतना "दीदी" बहुत याद आती है तुम्हारी "भाई" कहके बुलाना

This poem is for my all beloved sisters...........

bk omkar (scientist)

Saturday, July 25, 2015

भगवान की खोज !

Dear Angels❤

भगवान की खोज !

तेरहवीं सदी में महाराष्ट्र में एक प्रसिद्द संत हुए संत नामदेव। कहा जाता है कि जब वे बहुत छोटे थे तभी से भगवान की भक्ति में डूबे रहते थे। बाल -काल में ही एक बार उनकी माता ने उन्हें भगवान विठोबा को प्रसाद चढाने के लिए दिया तो वे उसे लेकर मंदिर पहुंचे और उनके हठ के आगे भगवान को स्वयं प्रसाद ग्रहण करने आना पड़ा।  आज हम उसी महान संत से सम्बंधित एक प्रेरक प्रसंग आपसे साझा कर रहे हैं।

एक बार संत नामदेव अपने शिष्यों को ज्ञान -भक्ति का प्रवचन दे रहे थे। तभी श्रोताओं में बैठे किसी शिष्य ने एक प्रश्न किया , ” गुरुवर , हमें बताया जाता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है , पर यदि ऐसा है तो वो हमें कभी दिखाई क्यों नहीं देता , हम कैसे मान लें कि वो सचमुच है , और यदि वो है तो हम उसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं ?”

नामदेव मुस्कुराये और एक शिष्य को एक लोटा पानी और थोड़ा सा नमक लाने का आदेश दिया।

शिष्य तुरंत दोनों चीजें लेकर आ गया।

वहां बैठे शिष्य सोच रहे थे कि भला इन चीजों का प्रश्न से क्या सम्बन्ध , तभी संत नामदेव ने पुनः उस शिष्य से कहा , ” पुत्र , तुम नमक को लोटे में डाल कर मिला दो। “

शिष्य ने ठीक वैसा ही किया।

संत बोले , ” बताइये , क्या इस पानी में किसी को नमक दिखाई दे रहा है ?”

सबने  ‘नहीं ‘ में सिर हिला दिए।

“ठीक है !, अब कोई ज़रा इसे चख कर देखे , क्या चखने पर नमक का स्वाद आ रहा है ?”, संत ने पुछा।

“जी ” , एक शिष्य पानी चखते हुए बोला।

“अच्छा , अब जरा इस पानी को कुछ देर उबालो।”, संत ने निर्देश दिया।

कुछ देर तक पानी उबलता रहा और जब सारा पानी भाप बन कर उड़ गया , तो संत ने पुनः शिष्यों को लोटे में देखने को कहा और पुछा , ” क्या अब आपको इसमें कुछ दिखाई दे रहा है ?”

“जी , हमें नमक के कण दिख रहे हैं।”, एक शिष्य बोला।

संत मुस्कुराये और समझाते हुए बोले ,” जिस प्रकार तुम पानी में नमक का स्वाद तो अनुभव कर पाये पर उसे देख नहीं पाये उसी प्रकार इस जग में तुम्हे ईश्वर हर जगह दिखाई नहीं देता पर तुम उसे अनुभव कर सकते हो। और जिस तरह अग्नि के ताप से पानी भाप बन कर उड़ गया और नमक दिखाई देने लगा उसी प्रकार तुम भक्ति ,ध्यान और सत्कर्म द्वारा अपने विकारों का अंत कर भगवान को प्राप्त कर सकते हो।”

                         Madhuban❤

निश्चय बुद्धि का अर्थ है विजयी......

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��निश्चय बुद्धि का अर्थ है विजयी।

��अगर कोइ हिसाब कुताब आता भी है तो मन को नही हिलाओ।

��स्थिति को उपर निचे नहीं करो चलो आया और उसे फट से उसको दूरसे ही खत्म कर दो।

➿अभी योगी बनो, योध्धे नहीं बनो।

��यदि ज्ञान योग अच्छा लगता है तो अच्छा लगना माना कर्म मे आना।

��योगी की निशानी है -
सदा क्लिन और क्लियर  बुध्धि।

��योगी कभी नहीं कहगा की पता नहीं....।

��उसकी बुध्धि सदा ही क्लियर होगी।

��धारणा स्वरूप की नीशानी है

➿- जिम्मेबारि संभालते हुए सदा जबल लाइट।

��चाहे मेला हो, चाहे झमेला हो- दोनो मे - दोनो मै डबल लाइट।

��सेवाधारी की निशानी है-

��सदा निमित और निर्वाण भाव।

��तो ये सभी अपनेमे चेक करो

��अनुभव करो - सर्व शक्तिमान बाप साथ है।

❇ बस एक बात भी अनुभव किया तो सब मे पास हो  जायेंगे।

बी.के. गिरीशभाइ।
ओम् शान्ति।

Tuesday, July 21, 2015

आध्यत्मिक जगत में भी कानून बने हुए हैं.......

जिस प्रकार लौकीक में कोई अपराध करने पर अपराधी को दंड मिलता है....
        उसी प्रकार आध्यत्मिक जगत में भी कानून बने हुए हैं,जहां हर गलत कर्म के लिए सजा के पात्र बनते हैं।

जिस प्रकार लौकिक दुनिया में हर बात के लिए कानून बने हुए हैं और उस कानून को तोड़ने पर उस व्यक्ति को सजा मिलती है।पुलिस और न्यायलय मिल कर उसे मुजरिम करार देते हैं और उसके अपराध के अनुसार उसे दण्ड देते है।लेकिन किसी भी मुजरिम को सजा तभी होती है जब पहले सुबूत और गवाह मौजूद हूँ ।

अगर सुबूत और गवाह नही है तो अपराध चाहे कितना ही बड़ा क्यों ना हो,सजा नही मिल सकती ।इसी प्रकार आध्यात्मिक
जगत में भी कानून बने हुए हैं ।कोई भी गलत बात सोचो,बोलो या करो तो आध्यात्मिक कानून के अनुसार दंड मिलता है।पाप का जन्म मन में होता है, बुद्धि उसका साथ देती है और संस्कार उसकी रिकॉर्डिंग करते हैं ।

अगर पाप का केवल संकल्प उतपन्न हुआ,वह कर्म में नही आया तो संस्कारों में उसकी रिकॉर्डिंग नही होगी और सजा से छूट जायेंगे ।लेकिन अगर वह पाप कर्म में आ गया तो जिन व्यक्तियों के साथ गलत हुआ उनके मन बुद्धि,संस्कार गवाह बनते हैं और फिर सजा से छूट नही सकते ।उन सुबूतो को मिटाने के लिए फिर बहुत मेहनत करनी पड़ेगी और समय लगाना पड़ेगा ।

जैसे दुनिया में किसी भी चीज को मिटाने के लिए उसे आग लगा दी जाती है ।इसी प्रकार मन, बुद्धि और संस्कारों में से विकर्म रूपी किचडे को जलाने के लिए तेज रूहानी आग चाहिए ।जो कि स्वयं को ज्योति बिंदु आत्मा समझ परम् ज्योति शिव बाबा की याद से प्रज्वलित होगी ।

अष्ट रत्न......

अष्ट रत्न बनने वाली आत्माओं की 8 विशेषताएं✏✏

�� अष्ट रत्न आत्मा ज्वालामुखी योग के द्वारा इस संसार से पूर्ण रूप से न्यारे होकर अपनी आत्मा को सम्पूर्ण पवित्रता की स्थिति में स्थित रखती है.

�� अष्ट रत्न आत्मा श्रीमत को साधारण रूप से पालन नहीं करती है. अपनी मन बुद्धि को पूर्ण रूप से बाबा के आगे अर्पित करती है. जो बाबा के मन में है वही उनके मन में होता है और जो बाबा की बुद्धि में है वही उनकी बुद्धि में होता है.

�� अष्ट रत्न अपनी पहचान देह की पहचान से नहीं देते है. वे सम्पूर्ण निरहंकारी होंगे और किसी भी रूप में धोखेबाज नहीं होंगे. वे अपना पार्ट ऐसे बजायेंगे जैसे कि उन्होंने ये शरीर एक पौशाक के रूप में पहना है. दुःख तो उनके लिए पराया शब्द होता है. वे पूर्ण निष्ठावान और मर्यादित होंगे.

��अष्ट रत्न का सूक्ष्म रूप से अटूट व मजबूत सम्बन्ध बाबा के साथ रहेगा और उसका ईश्वरीय परिवार के प्रति पूर्ण समर्पण भाव होगा.

�� अष्ट रत्न निस्वार्थ करुणा का रूप होंगे, हर प्रकार से निरंतर सेवाधारी होंगे. उनके हर व्यवहार में मनसा सेवा झ लकेगी.

��अष्ट रत्न सच्चाई के लिए प्रतिबद्ध होंगे और श्रेष्ठ कर्म के लिए किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं करेंगे.

�� अष्ट रत्न सदा बाबा को अपने सामने रखेंगे और स्मृति में रखेंगे कि बाबा से मिले स्नेह को ही वे रिटर्न में दे रहे हैं.

�� अष्ट रत्न सदा अपना समय और स्वांस प्यार और ख़ुशी से ईश्वरीय सेवा में अर्पित करेंगे!!!

                 ॐ शांति
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प्रेम सागर परम पिता......

प्रेम सागर परम पिता परमात्मा से घनिष्ट सम्बन्ध बनाता है सहनशील

����नदी, हवा, धरती कभी नही कहती कि हम कब तक इस तमोप्रधान मनुष्य की सेवा करें???सूर्य कभी नही कहता कि मुझे कब तक रोशनी देनी होगी??फूल कभी नही कहता कि मुझे कब तक सुगन्ध देनी होगी??लेकिन हम छोटी छोटी बातो पर ही झट कहने लगते हैं कि आखिर मुझे कब तक सहना पड़ेगा,पीड़ित होना पड़ेगा???

����कई ब्राह्मण बच्चे भी बात बात में कहते हैं कि हम बहुत सहन करते हैं, मरते हैं इतना तो शायद कोई कर नही सकता ।वे यह भूल जाते हैं कि प्यारे ब्रह्मा बाबा ने शिव बाबा का बनने के बाद जितना सहन किया उसका वर्णन स्वयं भगवान भी करते हैं । स्वयं से यह सवाल पूछें कि क्या हम ब्रह्मा बाबा जितना सहन कर सकते हैं??

����यह हमारा अभिमान है, जो बोलता है कि हम बहुत सहनशील है ।क्योकि सहनशील आत्मा सहन तो करती है लेकिन मुख से कभी उसका वर्णन नही करती, ना किसी को पता लग पाता है । वह हर पीड़ा को सूली से काँटा बना लेती है ।फिर भी अपने प्रेम की शक्ति से सदैव हर्षितमुख नजर आती है ।

��✨सदा याद रखें कि हमारा सम्बन्ध तो प्रेम के सागर परम् पिता परमात्मा से है, इसलिए हमे भी मास्टर प्रेम का सागर बन सबसे प्रेम करना है और मुख से कभी भी यह नही कहना कि आखिर कब तक पीड़ा को सहे???

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