Sunday, November 30, 2014

जो जितनी जिम्मेवारी लेता उतना

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भगवान का साथ

जो जितनी जिम्मेवारी लेता उतना ही बाप सहयोग देने का जिम्मेवार है ।जब बाप को जिम्मेवारी दे दी तो स्वयं नही उठानी चाहिए ।जिनके निमित बनते उनकी जिम्मेवारी अपनी समझते हो तो मुश्किल हो जाती है। जिम्मेवार बाप है ना की आप।अपने ऊपर बोझ तो नही रख लेते। कईयों को बोझ  उठाने की आदत होती है ।कितना भी कहो फिर भी उठा लेते हैं। यह ना हो जाए,ऐसा ना हो जाए यह व्यर्थ के बोझ है। बोझ बाप के ऊपर छोड़ दो तो सफलता भी ज्यादा और तरक्की भी ज्यादा मिलेगी।

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मैं आत्मा अविनाशी ज्ञान रत्नों का धंधा कर 21 जन्मों के लिए पदमापदम भाग्यशाली बनने वाली आत्मा हूँ।

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       Mera baba
आज का स्वमान

मैं आत्मा अविनाशी ज्ञान रत्नों का धंधा कर 21 जन्मों के लिए पदमापदम
भाग्यशाली बनने वाली आत्मा हूँ।

दुनिया में जीने के लिए सभी मनुष्य कोई ना कोई धंधा अवश्य करते हैं।भले ही कोई का धंधा रॉयल होता है तो कोई का छी-छी धंधा भी होता है।लेकिन इस विनाशी दुनिया में मनुष्य जो भी धंधा आदि करते हैं उनसे होने वाली प्राप्ति भी विनाशी ही होती है।

क्योकि यह है ही आसुरी दुनिया।और आसुरी दुनिया में किया जाने वाला हर धंधा आसुरी मत पर ही आधारित होता है।तो रावण की मत पर चल कर किये गए किसी भी धंधे में श्रेष्ठ प्राप्ति कैसे हो सकती है????~

श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ प्राप्ति तो सिर्फ एक ही धंधे में हो सकती है और वह धंधा है अविनाशी ज्ञान रत्नों का धंधा,जो इस समय संगम युग पर स्वयं परम पिता परमात्मा शिव बाबा ब्रह्ना मुख द्वारा हम ब्राह्मण को देते हैं।दुनिया के धंधे तो विकारों की उत्तपत्ति कर ओर ही मनुष्यों को पतन की और ले जाते हैं।

लेकिन परम् पिता परमात्मा से प्राप्त अविनाशी ज्ञान रत्नों का यह धंधा विकारो से छुडाए दैवी गुणों से भरपूर बनाने वाला है।21 जन्मों के लिए अपरम अपार सुखो से सम्पन्न बनाने वाला है।

तो सोचो कितने पदमा पदम भाग्यशाली हैं हम ब्राह्मण बच्चे जो हर कदम के साथ पदम् की कमाई जमा करते हैं।बाप से मिले अविनाशी ज्ञान रत्नों को धारण कर जब औरों को कराते हैं  तो इस धंधे से 21 जन्मों के लिए विश्व महाराजन बन पूरे विश्व पर राज्य करते हैं।
Omshanti

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बनी बनाइ बन रही अब कुछ बननी........



��साकार मुरलियो में प्रयुक्त हिंदी कहावत��

�� बनी बनाइ बन रही अब कुछ बननी नाहीं, चिंता ताकि कीजिये, जो अनहोनी होए (गुरुग्रंथ साहब)

जो कुछ होता है, ड्रामा में उसकी नुंध है। किसी भी बात की चिंता नहीं करनी चाहिए क्युकी यह अटल भावी है। जो होना है वही हो रहा है। उसे साक्षी होकर देखना है।



काम करने का समय निश्चित होना चाहिए

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अमृत वेले का महत्व

⏰काम करने का समय निश्चित होना चाहिए

��कई समझते हैं रात को जाग कर काम करते है तो अच्छा काम होता है।लेकिन बुद्धि थक जाती है और अमृत वेला ठीक ना होने के कारण जो कार्य दो गुणा होना चाहिए वह एक गुणा होता है।इस लिए time की limit होनी चाहिए।ऐसे तो बाप दादा बच्चों का उमंग उत्साह देख खुश भी होते हैं लेकिन फिर भी हद तो देनी पड़ेगी ना।

��सदा बुद्धि fresh रहे और fresh बुद्धि से जो काम होगा वह एक घण्टे में 2 घण्टे का काम कर सकते हैं जो सेवा याद में,उन्नति में रुकावट करने में निमित होती है तो ऐसी सेवा के समय को कम करना चाहिए।जैसे रात्रि को जागते हो।12 वा 1 बजा देते हो तो अमृत वेला fresh नही होगा।बैठते भी हो तो नियम प्रमाण।

और अमृत वेला शक्तिशाली नही तो सारे दिन की याद और सेवा में फर्क पड़ जाता है।मानो सेवा का plan बनाने में और सेवा को practical  लाने में समय भी लगता है। तो रात के समय को कट  करके 12 के बदले 11 बजे सो जाओ।वही एक घण्टा जो कम किया और शरीर को rest दी तो अमृत वेला अच्छा रहेगा।

बुद्धि भी fresh रहेगी नही तो दिल खाती है कि सेवा तो कर रहे हैं लेकिन याद का चार्ट जितना होना चाहिए उतना नही है।
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मैं राजयोग की पढ़ाई पढ़ माया.......

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��Mera Baba��

��आज का स्वमान��

��मैं राजयोग की पढ़ाई पढ़ माया से जीतने वाली सदा विजयी आत्मा हूँ।

��✨राजयोग माना परम पिता परमात्मा से योग लगा कर राजाई प्राप्त करना।मनुष्य जो लौकिक पढ़ाई  पढ़ते हैं वह तो विनाशी उंच पद की प्राप्ति करवाने वाली है क्योकि वह पढ़ाई पढ़ाने वाले भी इसी विनाशी दुनिया में रहने वाले नशवर देहधारी मनुष्य ही हैं।

किन्तु राजयोग की पढाई पढ़ाने वाला कोई साधारण मनुष्य नही बल्कि स्वयं निराकार ज्योति बिंदु परम पिता पर्मात्मा शिव बाबा हैं।
जो ऊँचे ते ऊँचे धाम परमधाम से ,ऊंच राजाई पद की प्राप्ति करवाने वाली ऊँची ते ऊँची राजयोग की पढ़ाई पढ़ाने के लिये आते हैं।

��और यह भी हर मनुष्य का व्यक्तिगत अनुभव है कि जितनी ऊंच और श्रेष्ठ प्राप्ति,उतने ही ज्यादा विघ्न।और क्योकि राजयोग की पढ़ाई अविनाशी ऊँच ते ऊँच पद की प्राप्ति करवाने वाली है।इसलिए सबसे ज्यादा विघ्न अर्थात माया के तूफ़ान भी राजयोग की पढ़ाई द्वारा राजाई प्राप्त करने वाले हम ब्राह्मण बच्चों के सामने ही ज्यादा आते हैं।

��लेकिन माया के तुफानो से बचने और माया पर विजय प्राप्त करने का मुख़्य आधार भी राजयोग ही है। अपने   वास्तविक आत्मिक  स्वरूप् में टिक कर आत्मा जब परमात्मा के साथ योग लगाती है।तो आत्मा में बल भरता है।

��✨परमात्मा की याद से आत्मा पर चडी 63 जनमो के विकारो की कट उतरती है और आत्मा पावनं बनती है
और निरन्तर सर्वशक्तिवान बाप क़ी छत्रछाया में रह कर सर्वशक्तियो द्वारा माया पर विजय प्राप्त करती है।
��Omshanti��
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अभी अभी अपने आसुरी संस्कारो.......

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           ��धर्मराज��

��अभी अभी अपने आसुरी संस्कारों को भस्म करने की हिम्मत रख संहारी रूप बने तो मुबारक है।अभी यह भी ध्यान रखना कि सूक्ष्म सजाओं के साथ साथ स्थूल सजाएं भी होती हैं।ऐसे नही समझना सूक्ष्म में मिलती हैं।

लेकिन ईश्वरीय मर्यादाओं प्रमाण कोई भी अगर अमर्यादा का कर्तव्य करते हैं मर्यादा उल्लंघन करते है तो ऐसे अमर्यादा से चलने वालों को स्थूल सजाएं भी भोगनी पड़ेंगीं।फिर तब क्या होगा???अपने दैवी परिवार स्नेह सम्बन्ध और जो वर्तमान समय की समाप्ति का खजाना है उससे वंचित होना पड़े।

इसलिए अब बहुत सोच समझ कर कदम उठाना है।ऐसे laws शक्तियों द्वारा स्थापन हो रहें हैं।पहले से ही सावधान करना चाहिए ना।फिर ऐसे नही कहना कि ऐसे तो हमने समझा नही था।

तो पहले से ही सुना रहे हैं।सूक्ष्म laws के साथ स्थूल laws वा नियम भी हैं।जैसे जैसे गलती ,उसी प्रमाण ऐसी गलती करने वालों को सजा
इसलिए law maker हो तो law को break नही करना।अगर law maker  भी law को break करेंगे तो फिर lawful राज्य कैसे कर सकेंगे।

इसलिए अब स्वयं को law maker समझ कर हर कदम lawful उठाओ।अर्थात श्रीमत प्रमाण उठाओ।

��⭕⭕⭕����⭕⭕⭕��

संगम पर बाबा ने swadartion

��✨��✨����✨��✨��
        ��भोर का सुर ��
��संगम पर बाबा ने swadartion चक्र के द्वारा अदि-मध्य-अंत का पूरा राज खोला है ��
��बाबा ने समझाया है ये दुनिया है देह की,देह के धर्मकी।��
��यहाँ हर कर्म देह के लिए होता है देह से होता है ��
��वो दुनिया परमात्मा पिता ने बनाई है आत्मा और आत्मा के धर्म के लिए ।��
��उस दुनिया में आत्मा ही सारे कर्म करती है आत्मा के लिए ही सारे कर्म करती है ।��
��ये सूक्ष्म अंतर है दोनों दुनियाओं में  ��
��ओम शान्ति-शुभ प्रभात��
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Spiritual Practices Vs. Life

Spiritual Practices Vs. Life

Spiritual practices and life are interconnected; so are my thoughts and actions. It is not possible to separate them.The immediate influence of any spiritual practice like meditation is on the quality of my thoughts. The quality of my thoughts is then reflected in my day-to-day actions. As the quality of my actions improves, it starts influencing my thoughts positively and the quality of my spiritual practice also starts improving.When I really understand this, it becomes clear that the right way to live is to marry both these sides within my life - meditation and practical life, marry the process of improving the quality of my thoughts with my actions, because both are interconnected with each other.

भोर का सुर

��✨��✨����✨��✨��
              ��भोर का सुर��
��संस्कार और उनका प्रभाव��
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बाबा कहते हैं ...
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बाप तुम्हें विश्व का मालिक बनाने के लिए आये हैं ।
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सतयुग में धरती भी तुम्हारी होगी आस्मां भी तुम्हारा होगा जल भी तुम्हारी होगा ।
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तो क्या अभी नहीं है ?
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नहीं है ।
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तो क्या अंतर आ गया सतयुग और अभी में ये तो बहुत महान अंतर हुआ ।
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अगर सेल्फ स्टडी की जाये और तीनों कालों की पढ़ाई पढ़ी जाये तो समझ में आता है कि
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सतयुग से लेकर संगम युग और अभी तक आत्मा के बुद्धि मन औए आकार प्रकृति और समय खाली हुए हैं और केवल संस्कार ही हैं जो बने हैं ।
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सतोप्रधान संस्कार थे तो दुनिया स्वर्ग थी तमो प्रधान संस्कार हैं तो दुनिया नर्क हो गई अर्थात कृत्रिम स्वर्ग हो गई ।
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सेल्फ स्टडी में ये भी समझ में आता है  कि...
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आत्मा के सतोप्रधान संस्कार हैं तो धरती आस्मां जल सबकुछ उसके कण्ट्रोल में है उसका है धरती आस्मां जल में वो कहीं भी जा सकती है क्योकि प्रकृति को भी आत्मा ने ही भरपूर किया है
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जब तमोप्रधान संस्कार  हैं तो सबकुछ आत्मा के हाथ से निकल जाता है
����
बचता उतना ही है जो उसकी हैसियत है ।
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तो समझ में आता है की संस्कार में पृथ्वी के चुम्बकत्व के लिए आकर्षण आ गया है इसलए आत्मा पृथ्वी से चिपक गई है आस्मां में जा नहीं सकती वायु और जल पर निर्भर  हो गई है ।
����
अब बाबा आकर आत्मा को मनुष्य से फ़रिश्ता  सो देवता बना रहे हैं
����
अर्थात संस्कार परिवर्तन कर रहे है 
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अर्थात जितना प्यार अपने तमोप्रधान संस्कारों से है  उतना ही प्यार पढ़ाई संस्कार परिवर्तन और और अपने बाकि संस्कारों से भी होना चाहिए ����
♨पढ़ाई संस्कारों को समझने और परिवर्तन होने तक चले ।♨
              ��ओम शान्ति��
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मन्सा सेवा के विशेष अनुभवी बनो

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    ��  मन्सा सेवा के विशेष अनुभवी बनो ��
                ➰ ➰ ➰ ➰ ➰ ➰
�� मन्सा सेवा के लिए बापदादा की प्रेरणायें
�� वर्तमान समय को तो देख ही रहे हो, दिन प्रतिदिन चारों ओर मनुष्य आत्माओं में निराशा बहुत बढ़ रही है। चाहे मन्सा सेवा करो, चाहे वाचा करो, चाहे सम्बन्ध सम्पर्क की करो, लेकिन बापदादा निराश मनुष्यों के अन्दर आशा का दीप जगाने चाहते हैं। यह आशा के दीपको की दीवाली बापदादा देखने चाहते हैं।
��  विश्व की आत्माओं को वर्सा दिलाना,दुःख से छुड़ाना, उसके लिए अपनी सम्पन्न स्थिति में रह मन्सा सेवा करनी है।जब मन्सा द्वारा चारों ओर शक्तिशाली किरणे फैलायेंगे तब विश्व का कल्याण होगा। जितना मन्सा सेवा में बिज़ी रहेंगे उतना समस्याओं से मुक्त हो जायेंगे, क्योंकि मन बुद्धि बिज़ी रहेगा, फ्री नहीं तो माया आएगी कहाँ, वापस चली जायेगी।
�� अब सेकण्ड में ज्वालामुखी स्वरूप में स्थित हो शक्तियों की किरणें फैलाओ। हे मेरे मास्टर विश्व रक्षक, शिव शक्तियाँ! सदैव मन्सा सेवा द्वारा सर्व आत्माओं को शक्ति दे सुख का, शान्ति का अनुभव कराओ।
�� अब प्राब्लम का दरवाज़ा बन्द करो। डबल लॉक लगाओ। डबल लॉक है- याद और सेवा सदा हाज़िर है, ऐसे नहीं चाँस ही नहीं दिया, मन्सा के लिए कोई नहीं रोकता। रात को भी जाग करके कर सकते हो, मन्सा द्वारा सकाश दो, आत्माओं का आह्वान करो, बिचारी दुःखी आत्मायें हैं, सहारा दो।

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    ��   ॐ शांन्ति  ��

बहुत समय पहले की बात है

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��Dear Angels !

बहुत समय पहले की बात है किसी गाँव में मोहन नाम का एक किसान रहता था . वह बड़ा मेहनती और ईमानदार था . अपने अच्छे व्यवहार के कारण दूर -दूर तक उसे लोग उसे जानते थे और उसकी प्रशंशा करते थे . पर एक दिन जब देर शाम वह खेतों से काम कर लौट रहा था तभी रास्ते में उसने कुछ लोगों को बाते करते सुना , वे उसी के बारे में बात कर रहे थे .

मोहन अपनी प्रशंशा सुनने के लिए उन्हें बिना बताये धीरे -धीरे उनके पीछे चलने लगा , पर उसने उनकी बात सुनी तो पाया कि वे उसकी बुराई कर रहे थे , कोई कह रहा था कि , “ मोहन घमण्डी है .” , तो कोई कह रहा था कि ,” सब जानते हैं वो अच्छा होने का दिखावा करता है …”
मोहन ने इससे पहले सिर्फ अपनी प्रशंशा सुनी थी पर इस घटना का उसके दिमाग पर बहुत बुरा असर पड़ा और अब वह जब भी कुछ लोगों को बाते करते देखता तो उसे लगता वे उसकी बुराई कर रहे हैं . यहाँ तक कि अगर कोई उसकी तारीफ़ करता तो भी उसे लगता कि उसका मजाक उड़ाया जा रहा है . धीरे -धीरे सभी ये महसूस करने लगे कि मोहन बदल गया है , और उसकी पत्नी भी अपने पति के व्यवहार में आये बदलाव से दुखी रहने लगी और एक दिन उसने पूछा , “ आज -कल आप इतने परेशान क्यों रहते हैं ;कृपया मुझे इसका कारण बताइये.”
मोहन ने उदास होते हुए उस दिन की बात बता दी . पत्नी को भी समझ नहीं आया कि क्या किया जाए पर तभी उसे ध्यान आया कि पास के ही एक गाँव में एक सिद्ध महात्मा आये हुए हैं , और वो बोली , “ स्वामी , मुझे पता चला है कि पड़ोस के गाँव में एक पहुंचे हुए संत आये हैं ।चलिये हम उनसे कोई समाधान पूछते हैं .”
अगले दिन वे महात्मा जी के शिविर में पहुंचे .
मोहन ने सारी घटना बतायी और बोला , महाराज उस दिन के बाद से सभी मेरी बुराई और झूठी प्रशंशा करते हैं , कृपया मुझे बताइये कि मैं वापस अपनी साख कैसे बना सकता हूँ ! !”
महात्मा मोहन कि समस्या समझ चुके थे .
“ पुत्र तुम अपनी पत्नी को घर छोड़ आओ और आज रात मेरे शिविर में ठहरो .”, महात्मा कुछ सोचते हुए बोले .
मोहन ने ऐसा ही किया , पर जब रात में सोने का समय हुआ तो अचानक ही मेढ़कों के टर्र -टर्र की आवाज आने लगी .
मोहन बोला , “ ये क्या महाराज यहाँ इतना कोलाहल क्यों है ?”
“पुत्र , पीछे एक तालाब है , रात के वक़्त उसमे मौजूद मेढक अपना राग अलापने लगते हैं !!!”
“पर ऐसे में तो कोई यहाँ सो नहीं सकता ??,” मोहान ने चिंता जताई।
“हाँ बेटा , पर तुम ही बताओ हम क्या कर सकते हैं , हो सके तो तुम हमारी मदद करो “, महात्मा जी बोले .
मोहन बोला , “ ठीक है महाराज , इतना शोर सुनके लगता है इन मेढकों की संख्या हज़ारों में होगी , मैं कल ही गांव से पचास -साठ मजदूरों को लेकर आता हूँ और इन्हे पकड़ कर दूर नदी में छोड़ आता हूँ .”
और अगले दिन मोहन सुबह -सुबह मजदूरों के साथ वहाँ पंहुचा , महात्मा जी  भी  वहीँ खड़े सब कुछ देख रहे थे .
तालाब जयादा बड़ा नहीं था , 8-10 मजदूरों ने चारों और से जाल डाला और मेढ़कों को पकड़ने लगे …थोड़ी देर की ही मेहनत में सारे मेढक पकड़ लिए गए.
जब मोहन ने देखा कि कुल मिला कर 50-60 ही मेढक पकडे गए हैं तब उसने माहत्मा जी से पूछा , “ महाराज , कल रात तो इसमें हज़ारों मेढक थे , भला आज वे सब कहाँ चले गए , यहाँ तो बस मुट्ठी भर मेढक ही बचे हैं .”
महात्मा जी गम्भीर होते हुए बोले , “ कोई मेढक कहीं नहीं गया , तुमने कल इन्ही मेढ़कों की आवाज सुनी थी , ये मुट्ठी भर मेढक ही इतना शोर कर रहे थे कि तुम्हे लगा हज़ारों मेढक टर्र -टर्र कर रहे हों . पुत्र, इसी प्रकार जब तुमने कुछ लोगों को अपनी बुराई करते सुना तो  भी  तुम यही गलती कर बैठे , तुम्हे लगा कि हर कोई तुम्हारी बुराई करता है पर सच्चाई ये है कि बुराई करने वाले लोग मुठ्ठी भर मेढक के सामान ही थे. इसलिए अगली बार किसी को अपनी बुराई करते सुनना तो इतना याद रखना कि हो सकता है ये कुछ ही लोग हों जो ऐसा कर रहे हों , और इस बात को भी समझना कि भले तुम कितने ही अच्छे क्यों न हो ऐसे कुछ लोग होंगे ही होंगे जो तुम्हारी बुराई करेंगे।”
अब मोहन को अपनी गलती का अहसास हो चुका था , वह पुनः पुराना वाला मोहन बन चुका था.
Friends, मोहन की तरह हमें भी कुछ लोगों के  व्यवहार को हर किसी का व्यवहार नहीं समझ लेना चाहिए और positive frame of mind  से अपनी ज़िन्दगी जीनी चाहिए। हम कुछ भी कर लें पर life में कभी ना कभी ऐसी समस्या आ ही जाती है जो रात के अँधेरे में ऐसी लगती है मानो हज़ारों मेढक कान में टर्र-टर्र कर रहे हों। पर जब दिन के उजाले में हम उसका समाधान करने का प्रयास करते हैं तो वही समस्या छोटी लगने लगती है. इसलिए हमें ऐसी situations में घबराने की बजाये उसका solution खोजने का प्रयास करना चाहिए और कभी मुट्ठी भर मेढकों से घबराना नहीं चाहिए.
                   ��Madhuban
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***प्रेम की बोली***

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***प्रेम की बोली***

आओ प्रेम की बोली बोलो

मन की सारी गांठें खोलो

बांटो एक दूजे को प्यार

करते रहो सबका सत्कार

अब ना कोई रहा पराया

बाबा ने सबको अपनाया

तोड़ो नफरत की दीवार

सारा जग अपना परिवार

एक बाप के बच्चे हैं हम

उसने हर लिए सारे गम

हँसते गाते बीते जीवन

सारा जग बन जाए मधुबन

चलें परिवर्तन की राह पर

जाना है हमको अब घर

ॐ शांति !!!
��❤��❤��❤��❤��❤��
यह आध्यात्मिक विचार एक बार  जरूर पढ़ कर देखें।✅

��जब कोई व्यक्ति अन्तरिक्ष में जाता है। तो उसका वजन ऊपर जाने पर कम होता जाता है। चन्द्रमा पर व्यक्ति का वजन 1/6 हो जाता हैं।
अगर आप केवल शरीर होते तो चन्द्रमा पर आप का वजन वही होना चाहिए।
ऊपर जाने पर हल्कापन अनुभव आत्मा ही करती है।
पृथ्वी से ऊपर जाने पर स्वतः ही हल्कापन अनुभव होने लगता है।।��

ये सचमुच सत्य है कि आप दूसरों को सफल होने में मदद करके सबसे तेजी और अच्छे से सफल हो सकते हैं.-सफलता��

 इच्छा सफलता का शुरूआती बिन्दु हैं, यह हमेशा याद दखें, जिस तरह छोटी आग से कम गर्माहट मिलती हैं उसी तरह कमजोर इच्छा से कमजोर परिणाम मिलते है।��

✅ अगर आपको अपने जीवन के लक्ष्य प्राप्त करने हैं तो आपको अपनी आत्मा से शुरुआत करनी होगी.��

✅✅✅✅✅✅✅✅✅(राज)
 प्रेम और उसका चक्र



प्रेम एक दैवी गुण है। ईश्वर को भी प्यार का सागर कहा गया है।
प्रेम की तुलना ईश्वर से की गई है।
इसीलिये कहा जाता है।
Love is God

प्रेम ही ईश्वर है।    God is love .
ईश्वर प्रेम ही  है। अब आप जान सकते हो। कि प्रेम कितना बड़ा दैवी गुण है।
फिर यह क्यों कहा जाता है। कि
Love is blind.
प्रेम के बारे में कई  गलत धारणायें
प्रचलित है।

प्रेम  का भूतकाल में अर्थ था ।
        स्नेह
स्      --     स्प्रेम
ने      --      नेकी
ह      --      हम राही

फिर प्रेम मोहब्बत में बदल गया।
           मोहब्बत
मो      ---     मोह
ह        ---     हवस
ब्ब      ---      बकवास
त        ---      तिरस्कार

फिर प्रेम वर्तमान समय Love में बदल गया ।
              Love

L     ----  lake of sorrow
                 (दुखों की झील)
O     ----  Ocean of tears
                  ( आसुओं का सागर)
V     ----   Valley of death
                   ( मौत की घाटी )
E       ----   End of life
                    ( जीवन का अन्त)
N
क्या जिस  प्रेम को ईश्वर कहा गया । उसकी यही परिभाषा है।
क्या यही प्यार है।
प्रेम तो एक पवित्र शुद्ध निर्मल मन की भावना है। जहाँ सुख ही सुख
आनन्द ही आनन्द है। वहाँ दुख जैसी बात ही नहीं । तभी तो इस को ईश्वर की उपमा दी गई।

         फिर प्रेम क्या है। 
         जानिए:-
��१:-    प्रेम का सम्बन्ध
सीधा ही (directly) आत्मा से है।
न कि शरीर से।
क्यों कि प्रेम जैसी पवित्र निर्मल भावना वहीं उत्पन्न हो सकती है।
जहाँ सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान और पवित्र शुद्ध व स्वच्छ मन हो।
देखिये
ज्ञान - पवित्रता - प्रेम - शान्ति - सुख- आनन्द- शक्ति।

तभी तो माँ -बेटे का , भाई - बहन का  आत्मा का परमात्मा से प्यार ही  कुछ हद तक सच्चा प्यार कहा गया है। जहाँ मन में बिल्कुल अशुद्धि नहीं है। इन प्रेम का गायन होता है।
न कि पति -पत्नि (विकारी प्रेम)के प्यार का।

 २:- मोह (Attachment) , आकर्षण (attraction), लगाव, झुकाव, मोहित होना । यह सब लगभग एक समान है।
मोह का सम्बन्ध directly
शरीर (देह) से है।
काम, क्रोध ,लोभ ,
मोह ........आदि। यह विकार होते है। इन का प्रेम से कोई सम्बन्ध नहीं है। शरीर के आकर्षण व लगाव को मोह कहा जाता है । प्रेम नहीं।

वर्तमान समय दुनिया में जिसे प्यार व प्रेम कहते है। वह वास्तव में मोह व लगाव (attraction) है।

प्रेम का पवित्र नाम है।  स्नेह

तो फिर प्रेम किसे कहा जाता है।
प्रेम आत्मिक स्नेह का रूप है। न कि आकर्षण का ।
✅प्रेम की अभिव्यक्ति कैसे होती है।
��१:- छोटे बड़े सब को सम्मान
देना ।  यह उस क्यक्ति के प्रति प्रेम है।
२:- किसी के प्रति दिल से शुभ भावना रखना। यह उस के प्रति स्नेह है।
��३:- किसी के अवगुणों को चित्त या दिल में नहीं रखना । किसी की गलती को क्षमा कर देना। यह स्नेह का रूप है।
४:- किसी को आगे बढ़ाने में सहयोग देना। उस की हर संभव मदद करना।
��५:-  दिल से दुआएं देना। खुश खैरात पूछना। यह भी स्नेह का रूप है।

��६:-  धन्यवाद ,कृतज्ञता( अहसान) भाव रखना। दिल से शुक्रिया
मानना । यह आत्माओं के प्रति तथा परमात्मा के प्रति स्नेह व प्यार है।

७:-  दया ,रहम करना । यह प्रेम का दूसरा रूप है।

��८:- किसी को आगे बढने के लिये उमंग उत्साह देना। किसी की बुरी आदत छुड़ाना ।

९:-  किसी के प्रति कल्याण की भावना रखना । किसी का भला सोचना।

��१०:-  किसी के गुण व विशेषताओं की प्रशंसा करना। 

११:- किसी के अच्छे कार्य के लिये मुबारक व बधाई देना।
.......॥
��संसार में जितने भी अच्छे कर्म है। वे अपने आप में प्रेम के रूप है।
प्रेम कोई चीज नहीं परन्तु यह प्रेम की अभिव्यक्ति के माध्यम है।

दुनिया में जिसे प्यार कहते है। वह वास्तव में प्रेम नहीं बल्कि मोह है।
इस में  ९५%मोह(attachment),
Attraction आकर्षण , विकारी भावना lust vices+ ५% प्रेम है।��

तभी दुनिया के प्रेम(मोह) का परिणाम पश्चाताप है।
सच्चा आत्मिक स्नेह सदा आनन्द व खुशी का अनुभव करता है।
तभी तो प्रेम को ईश्वर का रूप कहा है। प्रेम --:- ईश्वर।
 
प्रेम चक्र में चलता है। यह देने से मिलता है। मांगने से नहीं।  यह बांटने सेे बढ़ता है।��

विषय बड़ा है परन्तु संक्षिप्त रूप में लिखshare to all.

Pr....

लगाव मुक्त बन बेहद के वैरागी बनो।


लगाव मुक्त बन बेहद के वैरागी बनो।
��������

अभी समय प्रमाण बेहद की वैराग्य वृति को इमर्ज करो। बिना बेहद की वैराग्य वृति के सकाश की सेवा नही हो सकती।follow father करो। साकार में ब्रह्मा बाप रहा। निराकार की तो बात छोडो। साकार में सर्व प्राप्ति के साधन होते हुए,सर्व बच्चों की जिम्मेवारी होते हुए
,circumstanceसमस्याएं आते हुए pass हो गए ना।pass with honour का certificate ले लिया। विशेष कारण "बेहद की वैराग्य वृति"।

��अभी सूक्ष्म सोने की जंजीरों के लगाव,बेहद सूक्ष्म लगाव बहुत हैं। कई बच्चे तो लगाव को समझते भी नही हैं कि यह लगाव है। समझते हैं यह तो होता ही है,यह तो चलता ही है।ये अनेक प्रकार के लगाव बेहद के वैरागी बनने नही देते हैं। चाहना है बने,संकल्प भी करते हैं बनना ही है लेकिन चाहना और करना कम नही है। चाहना अधिक है करना कम है। करना ही है यह वैराग्य वृति अभी इमर्ज नही है।

बीच-2में इमर्ज होती है फिर मर्ज हो जाती है समय तो करेगा ही लेकिन pass with honour नही बन सकते।pass होंगे लेकिन pass with honour नही। समय की रफ्तार तेज है,पुरुषार्थ की रफ्तार कम है। मोटा मोटा पुरुषार्थ तो है लेकिन सूक्ष्म लगाव में बंध जाते हैं। बाप दादा जब बच्चों के गीत सुनते हैं--उड़ आये...उड़ आयें।तो सोचते है उड़ा तो ले लेकिन लगाव उड़ने देंगे???या ना इधर के रहेंगे ना उधर के रहेंगे।अभी समय प्रमाण बेहद के वैरागी बनो।
