❤
***प्रेम की बोली***
आओ प्रेम की बोली बोलो
मन की सारी गांठें खोलो
बांटो एक दूजे को प्यार
करते रहो सबका सत्कार
अब ना कोई रहा पराया
बाबा ने सबको अपनाया
तोड़ो नफरत की दीवार
सारा जग अपना परिवार
एक बाप के बच्चे हैं हम
उसने हर लिए सारे गम
हँसते गाते बीते जीवन
सारा जग बन जाए मधुबन
चलें परिवर्तन की राह पर
जाना है हमको अब घर
ॐ शांति !!!
❤❤❤❤❤
यह आध्यात्मिक विचार एक बार जरूर पढ़ कर देखें।✅
जब कोई व्यक्ति अन्तरिक्ष में जाता है। तो उसका वजन ऊपर जाने पर कम होता जाता है। चन्द्रमा पर व्यक्ति का वजन 1/6 हो जाता हैं।
अगर आप केवल शरीर होते तो चन्द्रमा पर आप का वजन वही होना चाहिए।
ऊपर जाने पर हल्कापन अनुभव आत्मा ही करती है।
पृथ्वी से ऊपर जाने पर स्वतः ही हल्कापन अनुभव होने लगता है।।
ये सचमुच सत्य है कि आप दूसरों को सफल होने में मदद करके सबसे तेजी और अच्छे से सफल हो सकते हैं.-सफलता
इच्छा सफलता का शुरूआती बिन्दु हैं, यह हमेशा याद दखें, जिस तरह छोटी आग से कम गर्माहट मिलती हैं उसी तरह कमजोर इच्छा से कमजोर परिणाम मिलते है।
✅ अगर आपको अपने जीवन के लक्ष्य प्राप्त करने हैं तो आपको अपनी आत्मा से शुरुआत करनी होगी.
✅✅✅✅✅✅✅✅✅(राज)
प्रेम और उसका चक्र
प्रेम एक दैवी गुण है। ईश्वर को भी प्यार का सागर कहा गया है।
प्रेम की तुलना ईश्वर से की गई है।
इसीलिये कहा जाता है।
Love is God
प्रेम ही ईश्वर है। God is love .
ईश्वर प्रेम ही है। अब आप जान सकते हो। कि प्रेम कितना बड़ा दैवी गुण है।
फिर यह क्यों कहा जाता है। कि
Love is blind.
प्रेम के बारे में कई गलत धारणायें
प्रचलित है।
प्रेम का भूतकाल में अर्थ था ।
स्नेह
स् -- स्प्रेम
ने -- नेकी
ह -- हम राही
फिर प्रेम मोहब्बत में बदल गया।
मोहब्बत
मो --- मोह
ह --- हवस
ब्ब --- बकवास
त --- तिरस्कार
फिर प्रेम वर्तमान समय Love में बदल गया ।
Love
L ---- lake of sorrow
(दुखों की झील)
O ---- Ocean of tears
( आसुओं का सागर)
V ---- Valley of death
( मौत की घाटी )
E ---- End of life
( जीवन का अन्त)
N
क्या जिस प्रेम को ईश्वर कहा गया । उसकी यही परिभाषा है।
क्या यही प्यार है।
प्रेम तो एक पवित्र शुद्ध निर्मल मन की भावना है। जहाँ सुख ही सुख
आनन्द ही आनन्द है। वहाँ दुख जैसी बात ही नहीं । तभी तो इस को ईश्वर की उपमा दी गई।
फिर प्रेम क्या है।
जानिए:-
१:- प्रेम का सम्बन्ध
सीधा ही (directly) आत्मा से है।
न कि शरीर से।
क्यों कि प्रेम जैसी पवित्र निर्मल भावना वहीं उत्पन्न हो सकती है।
जहाँ सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान और पवित्र शुद्ध व स्वच्छ मन हो।
देखिये
ज्ञान - पवित्रता - प्रेम - शान्ति - सुख- आनन्द- शक्ति।
तभी तो माँ -बेटे का , भाई - बहन का आत्मा का परमात्मा से प्यार ही कुछ हद तक सच्चा प्यार कहा गया है। जहाँ मन में बिल्कुल अशुद्धि नहीं है। इन प्रेम का गायन होता है।
न कि पति -पत्नि (विकारी प्रेम)के प्यार का।
२:- मोह (Attachment) , आकर्षण (attraction), लगाव, झुकाव, मोहित होना । यह सब लगभग एक समान है।
मोह का सम्बन्ध directly
शरीर (देह) से है।
काम, क्रोध ,लोभ ,
मोह ........आदि। यह विकार होते है। इन का प्रेम से कोई सम्बन्ध नहीं है। शरीर के आकर्षण व लगाव को मोह कहा जाता है । प्रेम नहीं।
वर्तमान समय दुनिया में जिसे प्यार व प्रेम कहते है। वह वास्तव में मोह व लगाव (attraction) है।
प्रेम का पवित्र नाम है। स्नेह
तो फिर प्रेम किसे कहा जाता है।
प्रेम आत्मिक स्नेह का रूप है। न कि आकर्षण का ।
✅प्रेम की अभिव्यक्ति कैसे होती है।
१:- छोटे बड़े सब को सम्मान
देना । यह उस क्यक्ति के प्रति प्रेम है।
२:- किसी के प्रति दिल से शुभ भावना रखना। यह उस के प्रति स्नेह है।
३:- किसी के अवगुणों को चित्त या दिल में नहीं रखना । किसी की गलती को क्षमा कर देना। यह स्नेह का रूप है।
४:- किसी को आगे बढ़ाने में सहयोग देना। उस की हर संभव मदद करना।
५:- दिल से दुआएं देना। खुश खैरात पूछना। यह भी स्नेह का रूप है।
६:- धन्यवाद ,कृतज्ञता( अहसान) भाव रखना। दिल से शुक्रिया
मानना । यह आत्माओं के प्रति तथा परमात्मा के प्रति स्नेह व प्यार है।
७:- दया ,रहम करना । यह प्रेम का दूसरा रूप है।
८:- किसी को आगे बढने के लिये उमंग उत्साह देना। किसी की बुरी आदत छुड़ाना ।
९:- किसी के प्रति कल्याण की भावना रखना । किसी का भला सोचना।
१०:- किसी के गुण व विशेषताओं की प्रशंसा करना।
११:- किसी के अच्छे कार्य के लिये मुबारक व बधाई देना।
.......॥
संसार में जितने भी अच्छे कर्म है। वे अपने आप में प्रेम के रूप है।
प्रेम कोई चीज नहीं परन्तु यह प्रेम की अभिव्यक्ति के माध्यम है।
दुनिया में जिसे प्यार कहते है। वह वास्तव में प्रेम नहीं बल्कि मोह है।
इस में ९५%मोह(attachment),
Attraction आकर्षण , विकारी भावना lust vices+ ५% प्रेम है।
तभी दुनिया के प्रेम(मोह) का परिणाम पश्चाताप है।
सच्चा आत्मिक स्नेह सदा आनन्द व खुशी का अनुभव करता है।
तभी तो प्रेम को ईश्वर का रूप कहा है। प्रेम --:- ईश्वर।
प्रेम चक्र में चलता है। यह देने से मिलता है। मांगने से नहीं। यह बांटने सेे बढ़ता है।
विषय बड़ा है परन्तु संक्षिप्त रूप में लिखshare to all.
Pr....