Sunday, November 30, 2014

भोर का सुर

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              ��भोर का सुर��
��संस्कार और उनका प्रभाव��
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बाबा कहते हैं ...
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बाप तुम्हें विश्व का मालिक बनाने के लिए आये हैं ।
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सतयुग में धरती भी तुम्हारी होगी आस्मां भी तुम्हारा होगा जल भी तुम्हारी होगा ।
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तो क्या अभी नहीं है ?
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नहीं है ।
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तो क्या अंतर आ गया सतयुग और अभी में ये तो बहुत महान अंतर हुआ ।
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अगर सेल्फ स्टडी की जाये और तीनों कालों की पढ़ाई पढ़ी जाये तो समझ में आता है कि
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सतयुग से लेकर संगम युग और अभी तक आत्मा के बुद्धि मन औए आकार प्रकृति और समय खाली हुए हैं और केवल संस्कार ही हैं जो बने हैं ।
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सतोप्रधान संस्कार थे तो दुनिया स्वर्ग थी तमो प्रधान संस्कार हैं तो दुनिया नर्क हो गई अर्थात कृत्रिम स्वर्ग हो गई ।
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सेल्फ स्टडी में ये भी समझ में आता है  कि...
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आत्मा के सतोप्रधान संस्कार हैं तो धरती आस्मां जल सबकुछ उसके कण्ट्रोल में है उसका है धरती आस्मां जल में वो कहीं भी जा सकती है क्योकि प्रकृति को भी आत्मा ने ही भरपूर किया है
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जब तमोप्रधान संस्कार  हैं तो सबकुछ आत्मा के हाथ से निकल जाता है
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बचता उतना ही है जो उसकी हैसियत है ।
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तो समझ में आता है की संस्कार में पृथ्वी के चुम्बकत्व के लिए आकर्षण आ गया है इसलए आत्मा पृथ्वी से चिपक गई है आस्मां में जा नहीं सकती वायु और जल पर निर्भर  हो गई है ।
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अब बाबा आकर आत्मा को मनुष्य से फ़रिश्ता  सो देवता बना रहे हैं
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अर्थात संस्कार परिवर्तन कर रहे है 
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अर्थात जितना प्यार अपने तमोप्रधान संस्कारों से है  उतना ही प्यार पढ़ाई संस्कार परिवर्तन और और अपने बाकि संस्कारों से भी होना चाहिए ����
♨पढ़ाई संस्कारों को समझने और परिवर्तन होने तक चले ।♨
              ��ओम शान्ति��
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