Saturday, August 29, 2015

बहुत याद आती है "दीदी" तुम्हारी मुझे "भाई" कहके बुलाना.........

बहुत याद आती है "दीदी" तुम्हारी मुझे "भाई" कहके बुलाना ,
वो मद्धम सा मुस्कुराना और वो झूठ-मूठ का गुस्सा दिखाना,
समझना मेरी हर बात को और मुझे हर बात समझाना,
वो लड़ना तेरा मुझसे और फिर प्यार जताना,
बहुत याद आती है "दीदी" तुम्हारी मुझे "भाई" कहके बुलाना,
वो शाम ढले करना बातें मुझसे और अपनी हर बात मुझे बताना,
सुनके मेरी बेवकूफियां तुम्हारा ज़ोर से हंस जाना,
मेरी हर गलती पे लगाना डांट और फिर उस डांट के बाद मुझे प्यार से समझाना,
कोई और न होगा तुमसे प्यारा मुझे यह आज मैंने है जाना,
वो राखी और भाई-दूज पे तुम्हारा टीका लगाना,कुमकुम मैं डूबी ऊँगली से मेरा माथा सजाना,
खिलाना मुझे मिठाई प्यार से और दिल से दुआ दे जाना,
बाँध के धागा कलाई पे मेरी अपने प्यार को जताना,
कभी बन जाना माँ मेरी और कभी दोस्त बन जाना,
देना नसीहतें मुझे और हिदायतें दोहराना,
जब छाये गम का अँधेरा तो खुशी की किरण बनके आना,हाँ तुम्ही से तो सिखा है मैंने गम मैं मुस्कुराना,
कहता है मन मेरा रहके दूर तुमसे मुझे अब एक लम्हा भी नही बिताना,अब बस "ॐकार" को तो है अपनी "गीता दीदी(all beloved sister)" के पास है जाना,
हैं बहुत से एहसास दिल मैं समाये पता नही अब इन्हे कैसे है समझाना

,बस जान लो इतना "दीदी" बहुत याद आती है तुम्हारी "भाई" कहके बुलाना

This poem is for my all beloved sisters...........

bk omkar (scientist)

Saturday, July 25, 2015

भगवान की खोज !

Dear Angels❤

भगवान की खोज !

तेरहवीं सदी में महाराष्ट्र में एक प्रसिद्द संत हुए संत नामदेव। कहा जाता है कि जब वे बहुत छोटे थे तभी से भगवान की भक्ति में डूबे रहते थे। बाल -काल में ही एक बार उनकी माता ने उन्हें भगवान विठोबा को प्रसाद चढाने के लिए दिया तो वे उसे लेकर मंदिर पहुंचे और उनके हठ के आगे भगवान को स्वयं प्रसाद ग्रहण करने आना पड़ा।  आज हम उसी महान संत से सम्बंधित एक प्रेरक प्रसंग आपसे साझा कर रहे हैं।

एक बार संत नामदेव अपने शिष्यों को ज्ञान -भक्ति का प्रवचन दे रहे थे। तभी श्रोताओं में बैठे किसी शिष्य ने एक प्रश्न किया , ” गुरुवर , हमें बताया जाता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है , पर यदि ऐसा है तो वो हमें कभी दिखाई क्यों नहीं देता , हम कैसे मान लें कि वो सचमुच है , और यदि वो है तो हम उसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं ?”

नामदेव मुस्कुराये और एक शिष्य को एक लोटा पानी और थोड़ा सा नमक लाने का आदेश दिया।

शिष्य तुरंत दोनों चीजें लेकर आ गया।

वहां बैठे शिष्य सोच रहे थे कि भला इन चीजों का प्रश्न से क्या सम्बन्ध , तभी संत नामदेव ने पुनः उस शिष्य से कहा , ” पुत्र , तुम नमक को लोटे में डाल कर मिला दो। “

शिष्य ने ठीक वैसा ही किया।

संत बोले , ” बताइये , क्या इस पानी में किसी को नमक दिखाई दे रहा है ?”

सबने  ‘नहीं ‘ में सिर हिला दिए।

“ठीक है !, अब कोई ज़रा इसे चख कर देखे , क्या चखने पर नमक का स्वाद आ रहा है ?”, संत ने पुछा।

“जी ” , एक शिष्य पानी चखते हुए बोला।

“अच्छा , अब जरा इस पानी को कुछ देर उबालो।”, संत ने निर्देश दिया।

कुछ देर तक पानी उबलता रहा और जब सारा पानी भाप बन कर उड़ गया , तो संत ने पुनः शिष्यों को लोटे में देखने को कहा और पुछा , ” क्या अब आपको इसमें कुछ दिखाई दे रहा है ?”

“जी , हमें नमक के कण दिख रहे हैं।”, एक शिष्य बोला।

संत मुस्कुराये और समझाते हुए बोले ,” जिस प्रकार तुम पानी में नमक का स्वाद तो अनुभव कर पाये पर उसे देख नहीं पाये उसी प्रकार इस जग में तुम्हे ईश्वर हर जगह दिखाई नहीं देता पर तुम उसे अनुभव कर सकते हो। और जिस तरह अग्नि के ताप से पानी भाप बन कर उड़ गया और नमक दिखाई देने लगा उसी प्रकार तुम भक्ति ,ध्यान और सत्कर्म द्वारा अपने विकारों का अंत कर भगवान को प्राप्त कर सकते हो।”

                         Madhuban❤

निश्चय बुद्धि का अर्थ है विजयी......

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��निश्चय बुद्धि का अर्थ है विजयी।

��अगर कोइ हिसाब कुताब आता भी है तो मन को नही हिलाओ।

��स्थिति को उपर निचे नहीं करो चलो आया और उसे फट से उसको दूरसे ही खत्म कर दो।

➿अभी योगी बनो, योध्धे नहीं बनो।

��यदि ज्ञान योग अच्छा लगता है तो अच्छा लगना माना कर्म मे आना।

��योगी की निशानी है -
सदा क्लिन और क्लियर  बुध्धि।

��योगी कभी नहीं कहगा की पता नहीं....।

��उसकी बुध्धि सदा ही क्लियर होगी।

��धारणा स्वरूप की नीशानी है

➿- जिम्मेबारि संभालते हुए सदा जबल लाइट।

��चाहे मेला हो, चाहे झमेला हो- दोनो मे - दोनो मै डबल लाइट।

��सेवाधारी की निशानी है-

��सदा निमित और निर्वाण भाव।

��तो ये सभी अपनेमे चेक करो

��अनुभव करो - सर्व शक्तिमान बाप साथ है।

❇ बस एक बात भी अनुभव किया तो सब मे पास हो  जायेंगे।

बी.के. गिरीशभाइ।
ओम् शान्ति।

Tuesday, July 21, 2015

आध्यत्मिक जगत में भी कानून बने हुए हैं.......

जिस प्रकार लौकीक में कोई अपराध करने पर अपराधी को दंड मिलता है....
        उसी प्रकार आध्यत्मिक जगत में भी कानून बने हुए हैं,जहां हर गलत कर्म के लिए सजा के पात्र बनते हैं।

जिस प्रकार लौकिक दुनिया में हर बात के लिए कानून बने हुए हैं और उस कानून को तोड़ने पर उस व्यक्ति को सजा मिलती है।पुलिस और न्यायलय मिल कर उसे मुजरिम करार देते हैं और उसके अपराध के अनुसार उसे दण्ड देते है।लेकिन किसी भी मुजरिम को सजा तभी होती है जब पहले सुबूत और गवाह मौजूद हूँ ।

अगर सुबूत और गवाह नही है तो अपराध चाहे कितना ही बड़ा क्यों ना हो,सजा नही मिल सकती ।इसी प्रकार आध्यात्मिक
जगत में भी कानून बने हुए हैं ।कोई भी गलत बात सोचो,बोलो या करो तो आध्यात्मिक कानून के अनुसार दंड मिलता है।पाप का जन्म मन में होता है, बुद्धि उसका साथ देती है और संस्कार उसकी रिकॉर्डिंग करते हैं ।

अगर पाप का केवल संकल्प उतपन्न हुआ,वह कर्म में नही आया तो संस्कारों में उसकी रिकॉर्डिंग नही होगी और सजा से छूट जायेंगे ।लेकिन अगर वह पाप कर्म में आ गया तो जिन व्यक्तियों के साथ गलत हुआ उनके मन बुद्धि,संस्कार गवाह बनते हैं और फिर सजा से छूट नही सकते ।उन सुबूतो को मिटाने के लिए फिर बहुत मेहनत करनी पड़ेगी और समय लगाना पड़ेगा ।

जैसे दुनिया में किसी भी चीज को मिटाने के लिए उसे आग लगा दी जाती है ।इसी प्रकार मन, बुद्धि और संस्कारों में से विकर्म रूपी किचडे को जलाने के लिए तेज रूहानी आग चाहिए ।जो कि स्वयं को ज्योति बिंदु आत्मा समझ परम् ज्योति शिव बाबा की याद से प्रज्वलित होगी ।

अष्ट रत्न......

अष्ट रत्न बनने वाली आत्माओं की 8 विशेषताएं✏✏

�� अष्ट रत्न आत्मा ज्वालामुखी योग के द्वारा इस संसार से पूर्ण रूप से न्यारे होकर अपनी आत्मा को सम्पूर्ण पवित्रता की स्थिति में स्थित रखती है.

�� अष्ट रत्न आत्मा श्रीमत को साधारण रूप से पालन नहीं करती है. अपनी मन बुद्धि को पूर्ण रूप से बाबा के आगे अर्पित करती है. जो बाबा के मन में है वही उनके मन में होता है और जो बाबा की बुद्धि में है वही उनकी बुद्धि में होता है.

�� अष्ट रत्न अपनी पहचान देह की पहचान से नहीं देते है. वे सम्पूर्ण निरहंकारी होंगे और किसी भी रूप में धोखेबाज नहीं होंगे. वे अपना पार्ट ऐसे बजायेंगे जैसे कि उन्होंने ये शरीर एक पौशाक के रूप में पहना है. दुःख तो उनके लिए पराया शब्द होता है. वे पूर्ण निष्ठावान और मर्यादित होंगे.

��अष्ट रत्न का सूक्ष्म रूप से अटूट व मजबूत सम्बन्ध बाबा के साथ रहेगा और उसका ईश्वरीय परिवार के प्रति पूर्ण समर्पण भाव होगा.

�� अष्ट रत्न निस्वार्थ करुणा का रूप होंगे, हर प्रकार से निरंतर सेवाधारी होंगे. उनके हर व्यवहार में मनसा सेवा झ लकेगी.

��अष्ट रत्न सच्चाई के लिए प्रतिबद्ध होंगे और श्रेष्ठ कर्म के लिए किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं करेंगे.

�� अष्ट रत्न सदा बाबा को अपने सामने रखेंगे और स्मृति में रखेंगे कि बाबा से मिले स्नेह को ही वे रिटर्न में दे रहे हैं.

�� अष्ट रत्न सदा अपना समय और स्वांस प्यार और ख़ुशी से ईश्वरीय सेवा में अर्पित करेंगे!!!

                 ॐ शांति
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प्रेम सागर परम पिता......

प्रेम सागर परम पिता परमात्मा से घनिष्ट सम्बन्ध बनाता है सहनशील

����नदी, हवा, धरती कभी नही कहती कि हम कब तक इस तमोप्रधान मनुष्य की सेवा करें???सूर्य कभी नही कहता कि मुझे कब तक रोशनी देनी होगी??फूल कभी नही कहता कि मुझे कब तक सुगन्ध देनी होगी??लेकिन हम छोटी छोटी बातो पर ही झट कहने लगते हैं कि आखिर मुझे कब तक सहना पड़ेगा,पीड़ित होना पड़ेगा???

����कई ब्राह्मण बच्चे भी बात बात में कहते हैं कि हम बहुत सहन करते हैं, मरते हैं इतना तो शायद कोई कर नही सकता ।वे यह भूल जाते हैं कि प्यारे ब्रह्मा बाबा ने शिव बाबा का बनने के बाद जितना सहन किया उसका वर्णन स्वयं भगवान भी करते हैं । स्वयं से यह सवाल पूछें कि क्या हम ब्रह्मा बाबा जितना सहन कर सकते हैं??

����यह हमारा अभिमान है, जो बोलता है कि हम बहुत सहनशील है ।क्योकि सहनशील आत्मा सहन तो करती है लेकिन मुख से कभी उसका वर्णन नही करती, ना किसी को पता लग पाता है । वह हर पीड़ा को सूली से काँटा बना लेती है ।फिर भी अपने प्रेम की शक्ति से सदैव हर्षितमुख नजर आती है ।

��✨सदा याद रखें कि हमारा सम्बन्ध तो प्रेम के सागर परम् पिता परमात्मा से है, इसलिए हमे भी मास्टर प्रेम का सागर बन सबसे प्रेम करना है और मुख से कभी भी यह नही कहना कि आखिर कब तक पीड़ा को सहे???

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Wednesday, July 15, 2015

सुस्ती

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                ❓सुस्ती ❓

��सुस्ती विकारो की मॉ  है,
      रावण उसका बाप है।

��रावण को ऐसे नही मार सकते
      जब तक सुस्ती नहीं गई है। 

��सुस्ती ऐसी होशियार है जो हमको
      बहाना बनाना सिखाती है। 

��बहाने बनाने वाले पढाई में
      रेगुलर, पंचुअल नहीं हो सकते।

��विशेष शुद्ध संकल्प रूपी प्रेरणा द्वारा

☺प्यारा सा मीठा सा याद��

�� से ॐ शान्ति ��

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31.3.07

✋✋

बापदादा ने पहले ख़ज़ाने के 3 खाते जमा करो यह पहले बताया है। तो क्या देखा 3 खाते कौनसे है वह तो याद होगा ना। फिर भी रेवाइस कर रहे है। एक है अपने पुरषार्थ से जमा का खाता बढ़ाना दूसरा है सदा स्वयं भी सन्तुष्ट रहे और दूसरे को भी संतुष्ट करे। विभिन्न संस्कार को जानते हुए भी संतुष्ट रहे और करे इससे दुआओ का खता जमा होता है। अगर किसी भी कारण से संतूष्ठ करने में कमी रह जाती है तो पुण्य के खाते में जमा नहीं होता। संतुष्ट पुण्य की चाबी है और तीसरा हैं सेवा में भी सदा निस्वार्थ, मैं पैन नहीं। मैंने किया या मेरा होना चाहिए यह मैं और मेरापन जहा सेवा में आ जाता है वहा पुण्य का खाता जमा नहीं होता। मेरापन के अनुभवी हो रॉयल रूप का भी मेरापन बोहोत है। रॉयल रूप का मेरापन साधारण मेरापन से लंबी है। जहा मैं और मेरेपन का स्वार्थ आ जाता है निस्वार्थ नहीं वह पुण्य का खाता कम हो जाता है। मेरा पन की लिस्ट कभी सुनाएंगे बड़ी लंबी है और सूक्ष्म है। बापदादा ने देखा अपने पुरषार्थ से यथाशक्ति सभी अपना अपना खाता जमाँ कर रहे है। लेकिन दुआओ का खाता और पुण्य का खता वह अभी बढ़ने की आवश्यकता है इसलिए तीनो जमा करने का अटेंशन संस्कार वैरायटी अभी भी दिखाई देंगे सबके संस्कार। अभी सम्पन्न नहि हुए है लेकिन हम हमारे ऊपर औरो के कमज़ोर स्वाभाव कमज़ोर संस्कारो का प्रभाव नहीं पढ़ना चाहिए। मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ कमज़ोर संस्कार शक्तिशाली नहीं है। मास्टर सर्वशक्तिवान के उपर कमज़ोर संकल्पों का प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। सेफ्टी का साधन है बापदादा के छत्र
छत्रछाया में रहना बापदादा से कंबाइंड रहना। छत्रचाया है श्रीमत। 31.3.07

✋✋

मास्टर दाता बनो।

☝बाप दादा अपने हर एक बच्चे से यही चाहते हैं कि ......अब मास्टर दाता बनो।

☝✨बाप से लिया है और लेते भी रहो लेकिन आत्माओ से लेने की भावना नही रखो।यह करे तो मैं करूँ।यह बदले तो मैं बदलूँ।ऐसा हो तो ऐसा हो...यह देने की नही लेने की भावनाएं हैं।ऐसा हो जाए तो... नही, होना ही है।मुझे रहम दिल बनना है।

मुझे शक्तियों का सहयोग देना है।मास्टर दाता बनो।अगर लेना है तो एक बाप से लो।अन्य आत्माओं से भी मिलता है तो बाप का दिया हुआ ही मिलेगा।तो दाता बन फ्रॉक दिल बनो।देना आता है ना?????या सिर्फ लेना आता है???और दे तो मैं दूँ यह नही।मुझे देना ही है।यही भावना रखो।

स्वयं को मेहमान समझो।

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✨अव्यक्त स्तिथि का अनुभव करना है तो एक शब्द याद रखो....
       ��.स्वयं को मेहमान समझो।

��✨मनसा,वाचा,कर्मणा~तीनो ही व्यक्त में होते अव्यक्त रहें इसके लिए हर कर्म करते  अपने को मेहमान समझो।अगर मेहमान समझेंगे तो फिर जो अंतिम सम्पूर्ण स्तिथि का वर्णन है वह इस मेहमान बनने से ही होगी।

��अपने को मेहमान समझेंगे तो फिर व्यक्त में होते हुए भी अव्यक्त में रहेंगे।मेहमान का किस के साथ भी लगाव नही होता है।हम इस शरीर में भी मेहमान हैं,इस पुरानी दुनिया में भी मेहमान हैं।जब शरीर में ही मेहमान हैं तो शरीर से भी क्या लगाव रखें।सिर्फ थोड़े समय के लिए यह शरीर काम में लाना है ।

����जितना यहाँ मेहमान बनेंगे उतना ही फिर वहाँ विश्व का मालिक बनेंगे।इस दुनिया के मालिक नही हैं,इस दुनिया में मेहमान हैं।नई दुनिया के मालिक हैं।यह जो व्यक्त भाव में आ जाते हैं,उसका कारण यही है~अपने को मेहमान नही समझते हैं।वस्तुओं पर भी अपना अधिकार समझते हैं।इसलिए उनमे attachment हो जाती है।अपने को अगर मेहमान समझो तो फिर सभी बातें खत्म हो जाएँ।

��✨✨��������✨✨��

अगर हम हर व्यक्ति के अवगुणों की बजाए उसके गुणों पर ही दृष्टि डालें तो........

गुण दर्शन से हमारे मन में भी गुण मूर्त संस्कार बन जायेंगे और जीवन प्रसनन्नता से भरपूर हो जाएगा.......

एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से टकराव तभी पैदा होता है जब उसकी दृष्टि दूसरों के अवगुणों पर जाती है।अवगुण देखने से उसके मन में उस मनुष्य के प्रति घृणा के भाव जागृत होते हैं।अत:सम्बन्धो को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है कि हम एक दूसरे में गुणों को देखें।और परस्पर गुणों का ही वर्णन करें।

हमे इस बात को बुद्धि में अच्छी रीति बिठा लेना चाहिए कि वर्तमान समय सभी की तमोप्रधान अवस्था है।अत:अवगुण तो सभी में भरे पड़े है।किसी में कोई अवगुण है तो किसी में कोई।अत: यह जानते हुए कि आज हर एक मानव अवगुणों से भरपूर है तो बार बार उन अवगुणों चिंतन करने या उनका वर्णन करने का क्या फायदा???

और फिर यह तो लॉ है कि मनुष्य जैसा चिंतन करता है वैसा ही वह स्वयं बन जाता है। तो क्या हमे दूसरों के अवगुणों का चिंतन करके स्वयं को भी उन्ही अवगुणों से सम्पन्न बनाना है????क्या स्वयं हममें पहले से ही अवगुण कम हैं??महानता तो इसमें है कि हम एक दूसरे अवगुणों का वर्णन करने करने की बजाए प्रेम पूर्ण व्यवहार एक दूसरे के अवगुणों को निकाले।

⚡✨✨✨✨⚡

शरीर ठीक नहीं , बुद्धि तो ठीक है न .......

��सदा साक्षी स्थिति में स्थित होकर पार्ट बजाओ तो कभी भी किसी पार्ट में चलायमान नहीं होंगे लेकिन न्यारे और प्यारे रहेंगे । अच्छे में अच्छा , बुरे में बुरा ऐसा नहीं होगा । साक्षी अर्थात् सदा हर कार्य करते हुए कल्याणकारी वृत्ति में रहने वाले । जो कुछ हो रहा है उसमें कल्याण भरा हुआ है ।

�� अगर माया का विघ्न भी आता तोउसमें भी लाभ उठाकर, शिक्षा लेकर आगे बढ़ेंगे , रूकेंगे नहीं । ऐसी साक्षीपन की सीट है जिस पर बैठकर ड्रामा को देखो तो बहुत मज़ा आयेगा । वाह ड्रामा वाह ! का गीत गाते रहेंगे । अगर कोई बीमार भी है , बिस्तर पर भी है तो भी सेवा कर सकते हैं । भले शरीर ठीक नहीं है लेकिन बुद्धि तो ठीक है न ?? मनसा सेवा बुद्धि द्वारा ही ठीक होती है । ऐसी लगन वा उमंग-उत्साह रख सेवा करेंगे तो ये प्रकृति भी आपकी जन्म-जन्म सेवा करती रहेगी । प्रकृति भी दासी बन जायेगी ।

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�� संकल्प की तीली लगाने से बिंदी से साँप हो जाता है ।

�� बिंदी लगाना आता है वा बिंदी पर क्वेश्चन आ जाता है ? आजकल की दुनिया में बारूद चलाते हैं जो इतनी छोटी बिंदी से इतना बड़ा साँप बन जाता है । यहाँ भी लगानी चाहिए बिंदी । बिंदी मे सब समा जाता है । अगर संकल्प की तीली लगा देते तो फिर वह साँप हो जाता । न तीली लगाओ न साँप बनो । बापदादा यह बच्चों का खेल देखता रहता है । जो होता है , सब में कल्याण भरा हुआ है । ऐसा क्यों वा क्या ? नहीं । जो कुछ अनुभव करना  वह किया । परिवर्तन किया और आगे बढ़ो । यह है बिंदी लगाना ।

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Wednesday, July 1, 2015

नियति/भाग्य का अर्थ

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��सृष्टि चक्र में जो हुआ था,जो हो रहा है और होगा वह पूर्व नियोजित है। यह ड्रामा बना बनाया है। यह हू-ब-हू 5000 वर्ष में repeat होता रहता है। इसके परिवर्तन में व्यक्ति स्वतंत्र नही है। विश्व की विशाल पृष्ठ भूमि पर
जड़ और चेतन के सयोंग से जो घटना अतीत में घटी है,वर्तमान में घट रही है और भविष्य में घटेगी वह सब पूर्व नियोजित है। इसमें रत्ती भर भी फेर बदल की गुंजाईश नही है।

��ड्रामा का यह राज त्रैकालिक सत्य है। जो होना था वही हुआ,वही हो रहा है और वही होगा। अनादि ड्रामा निरंतर चल रहा है।ज्ञान के अभाव में व्यक्ति यही कहता है यह मैंने किया,यह मेरा परिवार है,इसे मैंने बनाया। ऐसे ही ना जाने कितने व्यर्थ के दायित्वो का झूठा अहम अपने उपर लादे रहता है। समय की गति बड़ी धीमी और निमर्ल है लेकिन पूर्व निर्धारित ड्रामा की प्रक्रिया में ही सबको चलना है।

��नियति से अलग कुछ भी नही है। भाव और संकल्प के रूप में जो vibrations  उत्पन्न होते हैं वे भी पूर्व नियत हैं।स्थूल नेत्रों से देखने पर ऐसा लगता है कि दुःख-सुख,हानि-लाभ आदि घटना या परिस्तिथि के प्रभाव से हो रहें हैं लेकिन ज्ञान के दिव्य नेत्र से देखने पर व्यक्ति यह अनुभव करता है कि सब कुछ पूर्व नियोजित है।

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योग के विभिन मनोरंजक अभ्यास


�� पांच स्वरूपों का अभ्यास करना व फरिश्ता से देवता का पांच बार अभ्यास करना।

�� मेरे ऊपर एक ओर है ब्रह्मा माँ- मुझे शीतलता की किरणे दे रही है। फिर दूसरी ओर ऊपर है ज्ञान सूर्य शिव बाबा वे मुझे शक्तियों की किरणे दे रहे है। क्रमशः बार बार इसका अभ्यास करना।

�� इस विशव को वैसे ही साक्षी होकर देखें जैसे बाबा देखता है, यह सृष्टि चक्र पूरा हो रहा है अब मुझ आत्मा को वापस घर जाना है।

�� दिन में पांच बार सभी को आत्मिक दृष्टी से देखना।

�� निराकारी स्थिति का अभ्यास इस तरह करना- मेरा शरीर छूट गया, लोप हो गया और रह गई मैं चमकती हुई अति तेजस्वी आत्मा।
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Monday, June 29, 2015

मीठे बाबा को मीठी मीठी याद प्यार

��मीठे बाबा को मीठी मीठी याद प्यार��

मेरे प्यारे प्यारे और इस राजदुलारे के मीठे मीठे बापदादा अगर आपको कुछ लिखना चाहू तो भी क्या लिखू कैसे लिखू कहा से सुरु करू क्योकि मेरा ये पवित्रता से भरा ब्राह्मण जीवन सिर्फ चंद लब्ज़ में ही बयान हो जाएगा

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"तुम्ही से सुरु और तुम्ही पे खत्म"।
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥

बस आपको एक ही बात कहना चाहूँगा के....
आज तुमसे ये ब्राह्मण जन्म पाकर कहाँ से कहाँ और किस रूहानी ऊंचाई पे आगया।
अगर में आपका ब्राह्मण बच्चा न बनकर सिर्फ लौकिक में होता तो आज क्या और कहाँ होता ये सोच कर ही तन मन में कंपन सा छा जाता है।

शुक्रिया मेरे लौकिक जीवन को संगमयुग का हिरे तुल्य अलौकिक जीवन बनाकर ख़ुशी के जुले में जुलते सतयुग की बादशाही के सच्चे अर्थ में काबिल बनाने का।

कोई 1-2नही पर इस संगम युग की हर रूहानी प्राप्ति के लिए पदम् गुणा
������शुक्रिया������

Tuesday, March 24, 2015

अहंकार

✺✺✺✺✺✺ अहंकार ✺✺✺✺✺✺

कुछ लोग प्रेम नामक भाव के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहते। क्योंकि उन्हें सब तरफ से धोखा मिला है , अतः उन्होंने प्यार को तिलाँजलि दे दी है। वे समझते हैं कि यह बहुत जटिल, थका देने वाला है। वे कहते हैं, "मैं अब किसी के प्यार नहीं करने वाला और न ही मैं चाहता हु कोई मुझे प्यार करे।" वे प्यार के विषय में बात भी नहीं करना चाहते।" वे मातृ-प्रेम , मित्र-प्रेम या अन्य किसी प्रकार के प्रेम के विषय में सुनना ही नहीं चाहते।

ये ऐसे व्यक्ति हैं जो अंत में कह देते हैं, "मैं तो बस आजाद रहना चाहता हुँ।" वे सोचते हैं कि प्यार का अर्थ होना चाहिए इन चीजों से आजादी। वास्तव में यह एक प्रकार का अहंकार है। ऐसे लोग यह नहीं समजते कि यह संसार एक कर्मभूमि है और इस कर्मक्षेत्र को तथा हमारे जीवन को प्रेम रूपी जल की आवश्यकता है।

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