जिस प्रकार लौकीक में कोई अपराध करने पर अपराधी को दंड मिलता है....
उसी प्रकार आध्यत्मिक जगत में भी कानून बने हुए हैं,जहां हर गलत कर्म के लिए सजा के पात्र बनते हैं।
जिस प्रकार लौकिक दुनिया में हर बात के लिए कानून बने हुए हैं और उस कानून को तोड़ने पर उस व्यक्ति को सजा मिलती है।पुलिस और न्यायलय मिल कर उसे मुजरिम करार देते हैं और उसके अपराध के अनुसार उसे दण्ड देते है।लेकिन किसी भी मुजरिम को सजा तभी होती है जब पहले सुबूत और गवाह मौजूद हूँ ।
अगर सुबूत और गवाह नही है तो अपराध चाहे कितना ही बड़ा क्यों ना हो,सजा नही मिल सकती ।इसी प्रकार आध्यात्मिक
जगत में भी कानून बने हुए हैं ।कोई भी गलत बात सोचो,बोलो या करो तो आध्यात्मिक कानून के अनुसार दंड मिलता है।पाप का जन्म मन में होता है, बुद्धि उसका साथ देती है और संस्कार उसकी रिकॉर्डिंग करते हैं ।
अगर पाप का केवल संकल्प उतपन्न हुआ,वह कर्म में नही आया तो संस्कारों में उसकी रिकॉर्डिंग नही होगी और सजा से छूट जायेंगे ।लेकिन अगर वह पाप कर्म में आ गया तो जिन व्यक्तियों के साथ गलत हुआ उनके मन बुद्धि,संस्कार गवाह बनते हैं और फिर सजा से छूट नही सकते ।उन सुबूतो को मिटाने के लिए फिर बहुत मेहनत करनी पड़ेगी और समय लगाना पड़ेगा ।
जैसे दुनिया में किसी भी चीज को मिटाने के लिए उसे आग लगा दी जाती है ।इसी प्रकार मन, बुद्धि और संस्कारों में से विकर्म रूपी किचडे को जलाने के लिए तेज रूहानी आग चाहिए ।जो कि स्वयं को ज्योति बिंदु आत्मा समझ परम् ज्योति शिव बाबा की याद से प्रज्वलित होगी ।
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