अमृत वेले का महत्व
अपनी अवस्था को check करो
अगर ब्राह्मण जीवन की बनी हुई दिनचर्या प्रमाण कोई भी कर्म यथार्थ वा निरंतर नही करते,तो उसके अंतर के कारण पूजा में भी अंतर पड़ता है ।मानो कोई अमृत वेले उठने की दिनचर्या में विधिपूर्वक नही चलते तो पूजा में भी उनके पुजारी भी उस विधि में ऊपर नीचे करते। अर्थात पुजारी भी समय पर उठ कर पूजा नही करेगा,जब आया तब कर लेगा।
अमृत वेले जागृत स्तिथि में अनुभव नही करते ,मजबूरी से वा कभी सुस्ती,कभी चुस्ती के रूप में बैठते,तो पुजारी भी मज़बूरी से या सुस्ती से पूजा करेंगे,विधिपूर्वक पूजा नही करेंगे।
ऐसे हर दिनचर्या के कर्म का प्रभाव पूजनीय बनने में पड़ता है ।विधिपूर्वक ना चलना ,कोई भी दिनचर्या में ऊपर नीचे होना -यह भी अपवित्रता के अंश में गिनती में होता है।
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