Tuesday, December 2, 2014

बाहर का रूप देख घबराने से अच्छी सोच........

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वाह ड्रामा वाह

ड्रामा न्यायकारी,कल्याणकारी वा एक्यूरेट है।
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बाहर का रूप देख घबराने से अच्छी सोच बदल जाती,कर्म बन्धन में फंस जाते।

छोटी बात को बड़ी बनाना अर्थात परेशान होना वा अधिकारीपन की शान में रहना,यह अपनी स्तिथि के ऊपर आधार रखता है।क्या हो गया???या जो हुआ  वो अच्छा हुआ यह सोचना अपने ऊपर है।यह निश्च्य बुरे को भी अच्छे में बदल सकता है

क्योकि हिसाब~किताब चुक्तू होने के कारण वा ड्रामा अनुसार समय प्रति समय practical paper होने के कारण कई बातें अच्छे रूप में सामने आएंगी और कई बातों का बाहर का रूप नुकसान का भी होगा।

लेकिन नुक्सान के पर्दे के अंदर जो फायदा छिपा होता है अगर थोडा सा धैर्यवत अवस्था वा सहनशील स्तिथि से अंतर्मुखी हो कर देखें तो बाहर के पर्दे के अंदर जो फायदा छिपा है वही आपको दिखाई देगा।इसलिए ऊपर अर्थात बाहर के रूप को देखते हुए भी नही देखो।

बाहर के रूप को देख जल्दी घबरा जाते हो जिस कारण अच्छा सोचा हुआ भी बदल जाता है और कर्म बन्धन में फंसते हो।क्यों क्या?कैसे हो गया???मेरा ही भाग्य ऐसा था???ये रस्सियाँ बांधते जाते हो।ऐसे व्यर्थ संकल्प ही कर्म बंधन की सूक्ष्म रस्सियां हैं।

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